आम

फ्रिज से निकाल कर
टेबल पर चाकू के बिलकुल पास में
जहाँ कुछ गिलास रखे हुए थे टूटने से बचे
आम आम की ही शक्ल का था
लंगडा बेहद हरा लेकिन मीठा मशहूर
होंठों पर खुभ आई हुई मिठास सा

आम काटा गया बहुत सावधानी से
रखकर प्लेट में बांटा गया दोस्तों में
आम आम था
और इससे अधिक कोई उपयोगिता भी नहीं थी
दौड़ती भागती इस दुनिया में उस आम की

बीच के समय में जबकि फ्रिज से निकाल कर
टेबल पर चाकू के बिलकुल पास में
रखा हुआ आम कितना बांका सा नज़र आ रहा था
अब खाली हो गयी है उसकी जगह
जहाँ थोड़ी देर पहले सज रहा था वह कितनी शान से

रात सोने से पहले काफी देर तक
याद आती रही उस आम की
जो छिलके और गुठली निकालकर खा लिया गया
दरअसल आम के बारे में सोचते हुए
आम आदमी अक्सर ही इतना निर्मम हो जाता है
इससे अधिक वह और कुछ सोच नहीं पाता

भूल चुका होता है उन अमराइयों को
जहाँ चोरी छिपे आम खाने का मज़ा
पहरेदार की गालियों से कहीं और बढ़ जाता था
फिर भी जो कहता था उस वक़्त
चोरी छिपे मत खाओ मांग लो जितना जी चाहे
आम आदमी आम आदमी ही था उस वक़्त
जो अब ख़ास आदमी में तब्दील हो
कितना मूल्यहीन हो चुका है अब
चोरी छिपे खाते-खाते!

खाने को अक्सर अब भी खाए जाते हैं आम
बनारसी, लंगडा, सफेदा, कलमी, चौसा
पर फ्रिज से निकाल कर
टेबल पर चाकू के बिलकुल पास में
जहाँ कुछ गिलास रखे हुए थे टूटने से बचे
चाकू उठाते ही लगता है जैसे
आम आदमी खुद ही आम की शक्ल में छीलकर
रख दिया गया हो टेबल पर
और तब आम खाने में उतना मज़ा नहीं आता
जितना उस वक़्त आम खाते हुए
आम आदमी को आना चाहिए.

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पितृऋण

अभी कुछ दिन ही हुए हैं
कमरे की दीवार पर
तुम्हारी तस्वीर टंगे
अभी कुछ दिनों पहले ही
तुम्हारे सिरहाने बैठ
बांची थी रामायण
सुन्दरकाण्ड
गीता का द्वितीय अध्याय
ताकि तुम्हारा मोह कटे
मोह कटा या नहीं कटा
पर उसी शाम तुम नहीं रहे

कुछ भी जब शेष नहीं रह गया तुममें
तुम्हारी देह जमीन पर उतार दी गयी
सुलगा दी गयीं अगरबत्तियां
तुम्हारे सिरहाने
एक दिया जलाकर रख दिया गया

फिर कुछ लोग आये
शोक संतप्त परिवार को
ढाढ़स बंधाने के बाद
बांस की सीढ़ीनुमा अरथी पर
कसकर तुम्हें बाँध दिया गया
सफ़ेद कफ़न पर
सुर्ख लाल गुलाब
सचमुच, कितना खिल रहे थे
गुलाल छिड़क
पूजा अर्चना के बाद
तुम्हारी अरथी उठी

कांधा बदल-बदल
मैं भी तुम्हारे साथ चला
जब तक कि मस्जिद के किनारे बना हुआ
नदी का पुल नहीं आ गया
फिर उसी मोड़ से
अरथी श्मशान की ओर मुड़ गयी

कव्वे कांव-कांव कर रहे थे पेड़ों पर
माहौल में एक सकता सा छा गया था
या वह सिर्फ मेरे ही अन्दर था उस समय
मैं नहीं जानता

फिर कुछ लोगों ने
तुम्हारी चिता सजाई
जुगनू नाई के लड़के लुचई ने
मूड़ दिए मेरे बाल
नहाने धोने के बाद
सफ़ेद कौपीन पहन
मुझे खड़ा कर दिया गया
तुम्हारी चिता के पास
गुलाल लगाया
फूल चढ़ाए
चिता पर घी उड़ेल दिया
आखिरी बार तुम्हें प्रणाम अर्पित कर
चिता को अग्नि दिखाई
मुखाग्नि दी
सूरज डूब रहा था
पर तुम भी तो अनंत में समा रहे थे पिता
धू-धू कर जल रहे थे मेरी आँखों के सामने
उस समय किसे बताता अपने दुःख
किसके कंधे पर सर रखकर रोता?
कपाल-क्रिया आदि तमाम क्रिया-कर्म करने के बाद
उस दिन लौटते हुए श्मशान से
वह सचमुच कितनी कठोर वापसी थी
कि – रास्ता काफी लम्बा हो आया था
तुम खो गए थे अनंत में
और मैं अटका रह गया था उन्हीं क्षुद्रताओं में

अभी-अभी कुछ ही दिन हुए हैं
कमरे की तस्वीर पर तुम्हारी तस्वीर टंगे
तुम्हारी चिरपरिचित मुस्कराहट में
अभी भी कितनी माया, कितना मोह है
मैं नहीं जानता
और यह भी कि जब तुम्हारी तस्वीर मात्र ही रह गयी है
मेरे आसपास
उस पर चढ़ाई गयी माला के फूल भी सूख चुके हैं
वक़्त के गुज़र जाने के एक तीखे अहसास की तरह
परिवर्तन की इस प्रक्रिया में
इसी तरह घूमता है कालचक्र
कोई एक दिन
मैं भी इस कमरे की दीवार पर
तस्वीर सा टांग दिया जाऊंगा
उस पर चढ़ा दी जायेगी कोई माला
फूल सूख गए होंगे
फिर भी चढ़े रहेंगे इसी तरह
और फिर किसी दिन
कोई वह तस्वीर उतार कबाड़ में रख देगा.

यह जो जीवन है

स्वयं को रोकता हूँ
अब किसी भी बात पर
कान ही दूंगा नहीं
आत्मस्थ कर लूँगा
स्वयं को ही

मन कहीं भटके नहीं बाहर
पराये सुख न झांके
और दुःख अपने ही बहुत हैं
निर्वासित भले ही हो अभी मन
दूसरों की संध में हरगिज़ न झांके
मूँद ले आँखें

मगर यह बावरा मन
ज़रा सी छूट पाते ही
कई अनजान द्वीपों में भटक आता
नीले समंदर की थाह ले
मोती, माणिक और मूंगे के लिए
डुबकी लगाता है

और परछाईं की तरह जो डोलती है उम्र मेरी
मौन में जो बोलता है
मन के अतलतल में
किसी निर्लिप्त सा
रागमय अभिव्यक्ति जीवन की
सदा करता रहा
वह बावला
अब कहाँ है किस डगर
मैं नहीं होऊंगा
कहीं तब वह ही रहेगा
शेष वह ही कहेगा हर बार
जो अभिव्यक्त होना चाहता है
अभी तो पर्वत शिखर पर
शारदीया धूप सी तुम हो
और पत्ते झर रहे हैं
सब नया है नया होने के लिए
पुराना कुछ भी नहीं है
देशकाल की सीमाओं के पार जा
जो जानता है
मैं नहीं हूँ
एक कोई और है
हर वक़्त
मुझमें जागता है
हर हमेशा.

जीवन

मृत्यु के उस टीसते डंक में
कितनी पीड़ा
कितना अवसाद है
मेरे न रहने के बाद
मैं नहीं जानता
मृत्यु उससे अधिक और क्या है?
मैं नहीं मानता

उस क्षण विशेष की कल्पना
अभी भी जब मेरे लिए
उतनी ही शांत और स्थितप्रज्ञ है
ज़िंदगी का यह सिलसिला टूटने के बाद
सिनेमा के परदे पर चलती
फिल्म की रील टूटने की तरह
सभी कुछ जब एक गहन अन्धकार में
समा जायेगा
या उज्जवलतम प्रकाश में
समा जाऊँगा मैं
एकाएक मैंने सोचा
खिड़की के बाहर
फूल खिले थे
शांत और स्निग्ध
अपने आसपास से सर्वथा निश्चिंत
खिलते झरते हुए
इसी मिट्टी में
मैंने चुपचाप वैसा ही होने की कोशिश की
और जो मैं नहीं हो सका था
होना चाहता था
हो गया.

साक्षात्कार

आकाश और समुद्र
जहां मिलते हैं
अथाहे
उस नीले अनंत में
तुम्हें ही पाता हूँ
ओ ईश्वर,
मेरे पिता!
कुछ व्यक्त कर पाना
मुश्किल हो आता है जब मेरे लिए
ऐसी उस अनंतता में
प्रवेश पा लेने के बाद ही
तुम्हें पाया है मैंने
और अन्दर बाहर सब ओर से
मौन हो गया हूँ
प्रार्थना में जुड़ी
दो हथेलियों सा
यह मेरा तुमसे मिलना नहीं
तो और क्या है?