पितृऋण

अभी कुछ दिन ही हुए हैं
कमरे की दीवार पर
तुम्हारी तस्वीर टंगे
अभी कुछ दिनों पहले ही
तुम्हारे सिरहाने बैठ
बांची थी रामायण
सुन्दरकाण्ड
गीता का द्वितीय अध्याय
ताकि तुम्हारा मोह कटे
मोह कटा या नहीं कटा
पर उसी शाम तुम नहीं रहे

कुछ भी जब शेष नहीं रह गया तुममें
तुम्हारी देह जमीन पर उतार दी गयी
सुलगा दी गयीं अगरबत्तियां
तुम्हारे सिरहाने
एक दिया जलाकर रख दिया गया

फिर कुछ लोग आये
शोक संतप्त परिवार को
ढाढ़स बंधाने के बाद
बांस की सीढ़ीनुमा अरथी पर
कसकर तुम्हें बाँध दिया गया
सफ़ेद कफ़न पर
सुर्ख लाल गुलाब
सचमुच, कितना खिल रहे थे
गुलाल छिड़क
पूजा अर्चना के बाद
तुम्हारी अरथी उठी

कांधा बदल-बदल
मैं भी तुम्हारे साथ चला
जब तक कि मस्जिद के किनारे बना हुआ
नदी का पुल नहीं आ गया
फिर उसी मोड़ से
अरथी श्मशान की ओर मुड़ गयी

कव्वे कांव-कांव कर रहे थे पेड़ों पर
माहौल में एक सकता सा छा गया था
या वह सिर्फ मेरे ही अन्दर था उस समय
मैं नहीं जानता

फिर कुछ लोगों ने
तुम्हारी चिता सजाई
जुगनू नाई के लड़के लुचई ने
मूड़ दिए मेरे बाल
नहाने धोने के बाद
सफ़ेद कौपीन पहन
मुझे खड़ा कर दिया गया
तुम्हारी चिता के पास
गुलाल लगाया
फूल चढ़ाए
चिता पर घी उड़ेल दिया
आखिरी बार तुम्हें प्रणाम अर्पित कर
चिता को अग्नि दिखाई
मुखाग्नि दी
सूरज डूब रहा था
पर तुम भी तो अनंत में समा रहे थे पिता
धू-धू कर जल रहे थे मेरी आँखों के सामने
उस समय किसे बताता अपने दुःख
किसके कंधे पर सर रखकर रोता?
कपाल-क्रिया आदि तमाम क्रिया-कर्म करने के बाद
उस दिन लौटते हुए श्मशान से
वह सचमुच कितनी कठोर वापसी थी
कि – रास्ता काफी लम्बा हो आया था
तुम खो गए थे अनंत में
और मैं अटका रह गया था उन्हीं क्षुद्रताओं में

अभी-अभी कुछ ही दिन हुए हैं
कमरे की तस्वीर पर तुम्हारी तस्वीर टंगे
तुम्हारी चिरपरिचित मुस्कराहट में
अभी भी कितनी माया, कितना मोह है
मैं नहीं जानता
और यह भी कि जब तुम्हारी तस्वीर मात्र ही रह गयी है
मेरे आसपास
उस पर चढ़ाई गयी माला के फूल भी सूख चुके हैं
वक़्त के गुज़र जाने के एक तीखे अहसास की तरह
परिवर्तन की इस प्रक्रिया में
इसी तरह घूमता है कालचक्र
कोई एक दिन
मैं भी इस कमरे की दीवार पर
तस्वीर सा टांग दिया जाऊंगा
उस पर चढ़ा दी जायेगी कोई माला
फूल सूख गए होंगे
फिर भी चढ़े रहेंगे इसी तरह
और फिर किसी दिन
कोई वह तस्वीर उतार कबाड़ में रख देगा.

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टिप्पणियाँ

  • Nivedita Srivastava  On जून 6, 2011 at 8:13 पूर्वाह्न

    बेहद मार्मिक अभिव्यक्ति ………नमन !

  • drparveenchopra  On जून 17, 2012 at 9:33 अपराह्न

    सच में बेहद मार्मिक अभिव्यक्ति —
    एक बेटे की बेबसी दर्शाती ये पंक्तियां ..
    उस दिन लौटते हुए श्मशान से
    वह सचमुच कितनी कठोर वापसी थी
    कि – रास्ता काफी लम्बा हो आया था
    तुम खो गए थे अनंत में
    और मैं अटका रह गया था उन्हीं क्षुद्रताओं में

  • Himanshuh  On जून 18, 2012 at 8:44 पूर्वाह्न

    पहली बार इस साइट का लिंक मिला है भईया! क्यों नहीं दिया पहले!

    एक विचित्र-सा विनत् भाव देख रहा हूँ अपने मन में! आपकी शख्सियत की निर्मिति का रहस्य भी खुल ही रहा है भईया!
    इस ब्लॉग पर आने का हर्ष ही व्यक्त कर पा रहा हूँ..कविताओं पर क्या कहूँ अभी!

  • Maheshwari Kaneri  On जून 18, 2012 at 10:20 पूर्वाह्न

    बहुत मार्मिक पर सच…

  • प्रतिभा सक्सेना  On मार्च 3, 2014 at 11:58 पूर्वाह्न

    इस सब से गुज़रना, सारा -कुछ मन में समेटे रहना और फिर अनायास शब्दों में फूट पड़ना -कितना मुश्किल होता है …!

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